Surdas Ke Pad – Free NCERT Solutions & Notes for Class 10 Hindi Kshitij Chapter 1 (2026-27)

Table of Contents

परिचय: Surdas Ke Pad और उनकी भक्ति-भावना

Surdas ke Pad हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि हैं, जिन्हें ‘ब्रजभाषा का शेक्सपियर’ कहा जाता है। कक्षा 10 की एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ के पहले अध्याय में सूरदास के पद संकलित हैं, जो भगवान कृष्ण की बाललीलाओं और गोपियों के प्रति उनकी भक्ति को दर्शाते हैं। ये पद न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्ति आंदोलन की समझ के लिए भी आवश्यक हैं।

सूरदास जन्मांध थे, किंतु उनकी अंतर्दृष्टि इतनी प्रखर थी कि उन्होंने श्रीकृष्ण के जीवन के प्रत्येक पहलू को इतनी जीवंतता से चित्रित किया कि पाठक स्वयं को ब्रज की गलियों में खड़ा पाता है। इन पदों में भक्ति की सरलता, भावनाओं की गहराई और ब्रजभाषा की मधुरता का अद्भुत समन्वय मिलता है।

सूरदास के जीवन पर संक्षिप्त दृष्टि

जन्म और प्रारंभिक जीवन

सूरदास का जन्म 1478 ईस्वी के आसपास दिल्ली के निकट सीही नामक गाँव में हुआ माना जाता है। कुछ विद्वान उनका जन्म रुनकता (आगरा) में भी मानते हैं। जन्म से ही दृष्टिहीन होने के कारण उन्होंने प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं को अपने हृदय की आँखों से देखा और समझा।

वल्लभाचार्य से भेंट और भक्ति पथ पर अग्रसर

सूरदास की जीवन यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ आया जब वे श्री वल्लभाचार्य के संपर्क में आए। वल्लभाचार्य ने उन्हें कृष्ण भक्ति का मार्ग दिखाया और उनकी प्रतिभा को पहचाना। इसके बाद सूरदास ने अपना समस्त जीवन श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी लीलाओं के गायन में समर्पित कर दिया।

साहित्यिक योगदान

Surdas Ke Pad की प्रमुख रचना ‘सूरसागर’ है, जिसमें लगभग 1,00,000 पद होने का उल्लेख मिलता है, हालाँकि वर्तमान में लगभग 8,000 पद ही उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त ‘सूरसारावली’, ‘साहित्य लहरी’ और ‘नल-दमयन्ती’ उनकी अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं।

क्षितिज पाठ्यपुस्तक में संकलित पदों का विस्तृत विश्लेषण

पहला पद: “उधौ, मोहि ब्रज बिसरत नाहिं…”

इस पद में गोपी उद्धव से कहती है कि उन्हें ब्रज (वृंदावन) कभी नहीं भूलता। गोपी के माध्यम से सूरदास ने भक्ति के अनन्यता भाव को प्रकट किया है। इस पद की प्रमुख विशेषताएँ हैं:

  1. विरह की तीव्र अभिव्यक्ति: गोपी का कृष्ण के विरह में व्याकुल होना
  2. ब्रज के प्रति गहरी आसक्ति: ब्रज की प्रत्येक वस्तु से भावनात्मक जुड़ाव
  3. भक्ति की एकनिष्ठता: कृष्ण के प्रति समर्पण की भावना

भावार्थ: गोपी कहती है कि हे उद्धव, मुझे ब्रज कभी नहीं भूलता। मेरे तन-मन में ब्रज बसा हुआ है। कृष्ण के बिना प्रत्येक क्षण कष्टदायक है और ब्रज की स्मृतियाँ मुझे और अधिक व्यथित करती हैं।

दूसरा पद: “मैया! मैं नहिं माखन खायो…”

यह पद कृष्ण की बाललीला को दर्शाता है, जब माता यशोदा उन्हें माखन चुराने के लिए डाँटती हैं। इस पद में बालकृष्ण की चतुराई, मासूमियत और माता यशोदा के स्नेह का मनोहारी चित्रण है।

प्रमुख बिंदु:

  • बालकृष्ण की नटखट शरारतें
  • माता यशोदा का स्नेहिल क्रोध
  • ब्रजभाषा की सरलता और मधुरता
  • अनुप्रास और पुनरुक्ति अलंकार का सुंदर प्रयोग

तीसरा पद: “हरि हैं राजनीति पढ़ि आए…”

इस पद में गोपियाँ कृष्ण की चतुराई पर व्यंग्य करती हुए कहती हैं कि हरि (कृष्ण) राजनीति पढ़कर आए हैं और अब वे सीधी-सादी बातें भी घुमा-फिराकर कहते हैं। यह पद श्रीकृष्ण के द्वारका चले जाने के बाद की स्थिति को दर्शाता है।

विशेषताएँ:

  • गोपियों की व्यंग्यात्मक वाणी
  • प्रेम में छल-कपट का आरोप
  • भक्ति में विरह का मार्मिक चित्रण
  • सामाजिक संबंधों की सूक्ष्म अभिव्यक्ति

पदों की साहित्यिक विशेषताएँSurdas ke Pad

भाषा शैली

सूरदास ने ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जो तत्कालीन समय में जनसामान्य की भाषा थी। इसकी मधुरता और लालित्य ने भक्ति भावना को और अधिक सहज एवं प्रभावशाली बना दिया।

अलंकार योजना

  1. अनुप्रास: “माखन मुनि मान”
  2. उपमा: “मुख मानो चंद्र”
  3. रूपक: “नयनन के भोरे”
  4. यमक: “हरि हैं राजनीति पढ़ि आए” (हरि शब्द के दो अर्थ)

छंद योजना

सूरदास ने अधिकतर पदों में दोहा, चौपाई और सोरठा छंदों का प्रयोग किया है, जो गेयता की दृष्टि से उपयुक्त हैं।

भाव पक्ष

सूरदास के पद में श्रृंगार रस (विप्रलंभ श्रृंगार) और वात्सल्य रस की प्रधानता है। उन्होंने भक्ति को सहज मानवीय संबंधों के माध्यम से प्रस्तुत किया है।

पाठ से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर

लघु उत्तरीय प्रश्न (2 अंक)

प्रश्न 1: गोपी अपने आप को ‘अधिक भाग्यशाली’ क्यों मानती है?

उत्तर: गोपी स्वयं को अधिक भाग्यशाली मानती है क्योंकि उसे ब्रज में रहने का सौभाग्य प्राप्त है। वह कृष्ण की लीलास्थली में निवास करती है और कृष्ण की स्मृतियों से घिरी हुई है, जबकि उद्धव ब्रज से दूर हैं।

प्रश्न 2: ‘हरि हैं राजनीति पढ़ि आए’ – इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि कृष्ण द्वारका जाकर राजनीति सीखकर आए हैं और अब वे सीधी-सादी बातें भी घुमा-फिराकर कहते हैं। गोपियाँ इसके माध्यम से कृष्ण के व्यवहार में आए बदलाव पर व्यंग्य कर रही हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न – Surdas Ke Pad (5 अंक)

प्रश्न 1: सूरदास के पदों में व्यक्त वात्सल्य रस के उदाहरण सहित विवेचना कीजिए।

उत्तर: सूरदास के पदों में वात्सल्य रस का मनोहारी चित्रण मिलता है। ‘मैया! मैं नहिं माखन खायो’ पद में बालकृष्ण की शरारतें और माता यशोदा का स्नेह वात्सल्य रस के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। कृष्ण द्वारा माखन चुराने पर माता यशोदा का क्रोध वास्तव में स्नेह का ही रूप है। सूरदास ने बालकृष्ण की मासूमियत, चतुराई और माता के प्रेम को इस प्रकार चित्रित किया है कि पाठक के हृदय में वात्सल्य भाव स्वत: ही उमड़ने लगता है।

Surdas Ke Pad का सारांश तालिका

पद क्रमांकपद की पहली पंक्तिमुख्य भावरसप्रमुख अलंकार
1उधौ, मोहि ब्रज बिसरत नाहिं…ब्रज के प्रति गहरी आसक्ति और कृष्ण विरहविप्रलंभ श्रृंगारअनुप्रास, उपमा
2मैया! मैं नहिं माखन खायो…बालकृष्ण की नटखट शरारतें और माता का स्नेहवात्सल्यपुनरुक्ति, यमक
3हरि हैं राजनीति पढ़ि आए…गोपियों का कृष्ण के प्रति व्यंग्य और विरहविप्रलंभ श्रृंगारव्यंजना, उत्प्रेक्षा

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु

  1. सूरदास का भक्तिकाल में स्थान: सूरदास अष्टछाप के प्रमुख कवि थे और कृष्णभक्ति शाखा के स्तंभ माने जाते हैं।
  2. ब्रजभाषा की विशेषताएँ: कोमलकांत पदावली, मधुरता, सरलता और लोकप्रियता।
  3. सूरदास की काव्यगत विशेषताएँ:
    • वात्सल्य रस के सम्राट
    • बालकृष्ण का मनोहारी चित्रण
    • भक्ति और श्रृंगार का समन्वय
    • संगीतात्मकता और गेयता
  4. अलंकार प्रयोग: सूरदास ने अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग किया है, जो कथन को प्रभावशाली बनाते हैं।

अध्याय से संबंधित अभ्यास प्रश्न

NCERT पाठ्यपुस्तक के प्रश्नों के उत्तर

प्रश्न 1: गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही?

उत्तर: गोपियों ने उद्धव से कहा कि योग की शिक्षा उन लोगों को देनी चाहिए जिनके मन चंचल हैं, जिनके प्राणों में स्थिरता नहीं है, जो इंद्रियों को वश में नहीं कर पाते। गोपियों का मानना था कि उनका तो मन और इंद्रियाँ पहले से ही कृष्ण में लीन हैं, इसलिए उन्हें योग साधना की आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 2: प्रस्तुत पदों के आधार पर सूरदास के भक्ति भावना पर प्रकाश डालिए।

उत्तर: सूरदास की भक्ति भावना सगुण और सख्य भाव से ओत-प्रोत है। उन्होंने कृष्ण को सखा, प्रियतम और बालरूप में देखा है। उनकी भक्ति में अनन्यता, निश्छलता और समर्पण की भावना है। वे कृष्ण को इतना निकट मानते हैं कि उनके साथ सहज मानवीय संबंधों की कल्पना कर पाते हैं।

Also Read: 10th पास गवर्नमेंट जॉब्स 2026

Surdas Ke Pad अध्याय के महत्वपूर्ण शब्दार्थ

शब्दअर्थ
उधौउद्धव (कृष्ण के मित्र)
बिसरतभूलता
माखनमक्खन
मैयामाता
राजनीतिकूटनीति, चालाकी
भोरेबंधन
चतुराईचालाकी
ब्रजवृंदावन क्षेत्र
सुरतिस्मृति

सूरदास की रचनाओं की सूची

  1. सूरसागर: सूरदास की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना, जिसमें कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है।
  2. सूरसारावली: इसमें श्रीकृष्ण के जीवन की विभिन्न घटनाओं का वर्णन है।
  3. साहित्य लहरी: भक्ति और श्रृंगार से परिपूर्ण पदों का संग्रह।
  4. नल-दमयन्ती: महाभारत की कथा पर आधारित रचना।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: सूरदास जन्मांध थे, फिर उन्होंने इतना सजीव चित्रण कैसे किया?

उत्तर: सूरदास जन्म से दृष्टिहीन थे, किंतु उनकी अंतर्दृष्टि और कल्पनाशक्ति अत्यंत प्रखर थी। उन्होंने श्रवण और मनन के माध्यम से कृष्ण लीला को अपने हृदय में ग्रहण किया और उसे इतनी सजीवता से अभिव्यक्त किया कि पाठक को लगता है मानो वह स्वयं उस दृश्य को देख रहा हो।

प्रश्न 2: सूरदास के पदों को ‘पद’ क्यों कहा जाता है?

उत्तर: ‘पद’ का अर्थ है पैर या चरण, और काव्य में इसका प्रयोग ऐसे छंदबद्ध रचनाओं के लिए होता है जो गेय होते हैं। सूरदास के ये रचनाएँ संगीतात्मकता से परिपूर्ण हैं और गाए जाने के लिए उपयुक्त हैं, इसलिए इन्हें ‘पद’ कहा जाता है।

प्रश्न 3: सूरदास और तुलसीदार की भक्ति में क्या अंतर है?

उत्तर: सूरदास कृष्ण की सगुण भक्ति करते हैं और उन्हें बालरूप, सखारूप में देखते हैं, जबकि तुलसीदास राम की भक्ति करते हैं और उन्हें आदर्श राजा, पति और पुत्र के रूप में चित्रित करते हैं। सूरदास की भक्ति में माधुर्य भाव है, तो तुलसीदार की भक्ति में दास्य भाव प्रमुख है।

प्रश्न 4: कक्षा 10 की परीक्षा में Surdas Ke Pad से किस प्रकार के प्रश्न पूछे जा सकते हैं?

उत्तर: परीक्षा में व्याख्या, भावार्थ, काव्य-सौंदर्य, अलंकार पहचान, संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या और लघु तथा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न पूछे जा सकते हैं। पदों के भावों, रसों और छंदों से संबंधित प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 5: सूरदास के पदों को याद रखने की क्या सर्वोत्तम विधि है?

उत्तर: सूरदास के पदों को याद रखने के लिए:

  1. पहले उनके भावार्थ को समझें
  2. पदों को गाकर याद करने का प्रयास करें
  3. महत्वपूर्ण पंक्तियों को नोट करें
  4. नियमित रूप से दोहराएँ
  5. मित्रों के साथ चर्चा करें

अध्याय को समझने के लिए उपयोगी सुझाव

  1. पदों को गाकर पढ़ें: सूरदास के पद संगीतात्मक हैं, इन्हें गाकर पढ़ने से याद करने में सहायता मिलेगी।
  2. भावचित्र बनाएँ: पदों में वर्णित दृश्यों का मानसिक चित्रण करने का प्रयास करें।
  3. समूह चर्चा: सहपाठियों के साथ पदों की व्याख्या पर चर्चा करें।
  4. लेखन अभ्यास: महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर स्वयं लिखने का अभ्यास करें।
  5. ऑडियो सामग्री का उपयोग: ऑनलाइन उपलब्ध ऑडियो रिकॉर्डिंग सुनें।

निष्कर्ष

सूरदास के पद हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं, जो भक्ति भावना की सहज अभिव्यक्ति के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत करते हैं। कक्षा 10 के छात्रों के लिए यह अध्याय न केवल परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि साहित्यिक समझ विकसित करने और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का भी एक सुअवसर प्रदान करता है। सूरदास की काव्यभाषा की सरलता, भावों की गहनता और अभिव्यक्ति की माधुर्यता हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगी।

इस अध्याय का गहन अध्ययन छात्रों को न केवल परीक्षा में उत्कृष्ट अंक दिलाने में सहायक होगा, बल्कि उनके साहित्यिक बोध और सांस्कृतिक चेतना को भी समृद्ध करेगा। सूरदास के पदों में निहित भक्ति, प्रेम और मानवीय संबंधों की सहज अभिव्यक्ति आज के युग में भी प्रासंगिक है और मनुष्य को आंतरिक शांति और आनंद की अनुभूति कराती है।

Leave a Comment